Monday, 16 October 2017

रिहाई

आज चाँद रिहा हुआ था अपनी ही कैद से
उसने खुद को ही रिहा किया था;
कुछ वक्त से छुपाए हुए थे वो दाग उसने जो मोहब्बत में मिले थे उसे।
वो भी मोहब्बत कर बैठा था एक सितारे से;
वो सितारा दूर कहीं टिमटिमाता रहता था
और चाँद उसे देख देख उसकी चाँदनी में डूबा रहता था।
एक रात वो सितारा फ़लक से टूट चाँद पर जा गिरा
आग उसकी ऐसी कि उसने चाँद के कई ज़र्रों को जला डाला।
चाँद ऐसा जला कि वक्त उसके दाग न मिटा सका
मगर आज चाँद रिहा हुआ था ख़ुद से,
आख़िर उसे समझ आ गया था कि दागों में भी मोहब्बत है
क्योंकि वो दाग गवाह हैं चाँद- सितारे की मोहब्बत का
अब हर रात वो दाग ही सुनाते हैं दुनिया को एक मोहब्बत की दास्ताँ।



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